कीचड़ वाला पानी पीने को मजबूर मासूम, 70 साल बाद भी विकास से कोसों दूर गांव! सिस्टम के दावों पर उठे बड़े सवाल…
दुमका (झारखंड): एक ओर देश में विकास और हर घर तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं झारखंड के दुमका जिले का एक छोटा-सा आदिवासी टोला आज भी पीने के साफ पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए संघर्ष कर रहा है। यहां की तस्वीरें और हालात ऐसे हैं, जिन्हें देखकर किसी का भी दिल दहल जाए।

मसलिया प्रखंड के गोलपुर गांव स्थित पहाड़िया टोला में रहने वाले करीब 15 परिवार वर्षों से पेयजल संकट झेल रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके का चापाकल लंबे समय से खराब पड़ा है और जलमीनार भी कई वर्षों से बंद है। ऐसे में लोगों के सामने गंदे डोभा (जलभराव) का पानी इस्तेमाल करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा।
गंदे पानी से बन रहा खाना, बढ़ रही बीमारियां

ग्रामीणों का कहना है कि जिस पानी को देखकर लोग छूना भी पसंद न करें, उसी पानी से यहां खाना बनाया जा रहा है और वही पानी पीने की मजबूरी है। दूषित पानी के कारण बच्चों और महिलाओं की तबीयत लगातार बिगड़ने की बात भी सामने आई है। कई परिवारों का कहना है कि बीमारी बढ़ने के बावजूद समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं।
राशन वितरण पर भी उठे सवाल

स्थानीय लोगों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भी अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि तय मात्रा से कम राशन दिया जा रहा है और कई बार समय पर अनाज भी नहीं मिलता। कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के नाम पर अवैध रकम मांगी गई।
सड़क और आवास जैसी सुविधाओं का भी अभाव

ग्रामीणों के अनुसार टोले तक पहुंचने वाली सड़क अधूरी है, जिससे बारिश के दिनों में हालात और खराब हो जाते हैं। कई परिवार अब भी पक्के मकान से वंचित हैं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
प्रशासन ने जांच का दिया भरोसा
मामले पर स्थानीय प्रशासन का कहना है कि शिकायत मिलने के बाद जांच के निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार क्षेत्र की स्थिति का आकलन कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि उनकी समस्याएं नई नहीं हैं और वर्षों से समाधान का इंतजार किया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल…
अगर आज भी किसी गांव के लोग साफ पानी, सड़क, राशन और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो विकास के दावे आखिर जमीन पर कब दिखाई देंगे? यह सवाल सिर्फ एक गांव का नहीं, बल्कि उन तमाम दूरदराज़ इलाकों का है जहां आज भी लोग सम्मानजनक जीवन के लिए जूझ रहे हैं।














