सारंगढ़ का ‘रीवापार घोटाला’: बिना दुकान लाखों के GST बिल, पंचायत में कागजों से निगल लिया विकास का पैसा!
सारंगढ़। छत्तीसगढ़ सरकार ने गांवों के विकास के लिए करोड़ों की राशि पंचायतों को सौंपी, लेकिन सारंगढ़ जनपद की ग्राम पंचायत रीवापार में विकास की तस्वीर कागजों तक ही सीमित नजर आ रही है। यहां लाखों रुपए के GST बिल लगाए गए, लेकिन जिन दुकानों से सामग्री खरीदी दिखायी गई, उनका जमीनी अस्तित्व ही संदिग्ध बताया जा रहा है। इससे पंचायत में बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितता की आशंका ने तूल पकड़ लिया है।
बिल हैं, दुकान नहीं — फिर पैसा गया कहाँ?
दस्तावेजों के अनुसार पंचायत में निर्माण सामग्री खरीदी दिखाकर भुगतान किया गया, लेकिन ग्रामीणों और स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन फर्मों के नाम पर बिल लगाए गए, वे मौके पर मौजूद नहीं हैं। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि जब दुकान ही नहीं थी, तो आखिर लाखों का सामान किससे खरीदा गया?



कागजों में विकास, जमीन पर सन्नाटा
रीवापार गांव में आज भी कई बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। नालियों का अभाव, अधूरे निर्माण और मूलभूत सुविधाओं की कमी यह संकेत देती है कि खर्च दिखाए गए पैसे का असर धरातल पर नहीं दिख रहा।
एक ग्रामीण ने नाराजगी जताते हुए कहा—
“अगर लाखों रुपए खर्च हुए होते, तो गांव की हालत बदलती। यहां तो सिर्फ कागजों में काम पूरा दिखाया गया है।”
GST बिल बना घोटाले का हथियार?
सूत्रों के मुताबिक, फर्जी या संदिग्ध फर्मों के माध्यम से बिल लगाकर भुगतान की प्रक्रिया पूरी की गई। इस तरह की व्यवस्था में वास्तविक खरीदी के बिना ही सरकारी राशि निकालने की आशंका जताई जा रही है।
जिम्मेदारों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना भौतिक सत्यापन के भुगतान कैसे स्वीकृत हुआ? क्या संबंधित अधिकारियों ने मौके पर जांच की, या फिर दस्तावेजों के आधार पर ही राशि जारी कर दी गई? यदि जांच के बिना भुगतान हुआ है, तो यह प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत का संकेत हो सकता है।
ग्रामीणों की मांग — हो निष्पक्ष जांच, तय हो जिम्मेदारी
रीवापार के ग्रामीण अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि पंचायत का पैसा गांव के विकास के लिए है, न कि कागजी खानापूर्ति के लिए।
अब प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
रीवापार पंचायत का यह मामला सामने आने के बाद पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में जांच कर पारदर्शिता सुनिश्चित करता है या नहीं।









