देहदान से भी निभाई मानव सेवा, समाजसेवी गणेश दास मानिकपुरी ने जीवन के बाद भी रचा प्रेरणा का अध्याय…

सारंगढ़-बिलाईगढ़ | 22 जुलाई 2026 समाजसेवा, सादगी और मानवीय मूल्यों के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ समाजसेवी गणेश दास मानिकपुरी अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनका अंतिम निर्णय उन्हें हमेशा यादगार बना गया। उन्होंने अपने निधन के बाद अपना पार्थिव शरीर मेडिकल शिक्षा और शोध कार्यों के लिए दान करने का संकल्प लिया था, जिसे उनके निधन के बाद पूरा किया गया।
80 वर्षीय गणेश दास मानिकपुरी का आकस्मिक निधन बुधवार को हुआ। जीवनभर समाजहित में सक्रिय रहने वाले मानिकपुरी ने देहदान का निर्णय लेकर यह संदेश दिया कि इंसान मृत्यु के बाद भी समाज और चिकित्सा विज्ञान की सेवा कर सकता है। उनका यह कदम चिकित्सा छात्रों और स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए उपयोगी साबित होगा तथा लोगों को देहदान के प्रति जागरूक करेगा।
गणेश दास मानिकपुरी का व्यक्तित्व केवल समाजसेवा तक सीमित नहीं था। वे छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के सेवानिवृत्त कर्मचारी रहे और अविभाजित मध्यप्रदेश के समय कर्मचारी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए इंटक के महामंत्री के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। अपने स्पष्ट विचार, निर्भीक स्वभाव और जनहित के मुद्दों पर बेबाक आवाज उठाने के कारण वे समाज में विशेष सम्मान पाते थे।
वे रामायण के गंभीर अध्येता, टीकाकार और चिंतक के रूप में भी जाने जाते थे। धार्मिक और साहित्यिक पुस्तकों का अध्ययन उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। ग्रामीण विकास, सामाजिक जागरूकता और जनकल्याण से जुड़े विषयों पर वे लगातार चिंतन और संवाद करते रहे।
मानिकपुरी ने जीवनभर सादा जीवन अपनाया। वे शाकाहार, नशामुक्ति, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक समरसता के समर्थक रहे। उन्होंने समाज में नशे के खिलाफ जनजागरूकता अभियान चलाए और जातिवाद, अंधविश्वास तथा सामाजिक आडंबर का खुलकर विरोध किया।
उनके निधन से सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत को बड़ी क्षति पहुंची है। वे अपने पीछे परिवार, शुभचिंतकों और समाजसेवा की ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को मानवता, सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी के लिए प्रेरित करती रहेगी।
















