कई महीनों से स्कूल से गायब प्रधान पाठक का अहंकार!
क्या उखाड़ लेंगे मेरा?” — शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल**
धरमजयगढ़। धरमजयगढ़ विकासखंड की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। ग्राम पंचायत नागदरहा के आश्रित ग्राम बारूखोल स्थित प्राथमिक शाला में जो हालात सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। आरोप है कि यहां पदस्थ प्रधान पाठक देव कुमार महंत लंबे समय से स्कूल से अनुपस्थित हैं। न कोई आधिकारिक सूचना, न अवकाश स्वीकृति — और न ही नियमों का भय।
ग्रामीणों के अनुसार, कई महीनों से प्रधान पाठक विद्यालय नहीं पहुंचे हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। अभिभावकों में गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि स्कूल में शिक्षण व्यवस्था लगभग ठप है, जबकि कागजों में सब कुछ सामान्य दर्शाया जा रहा है।
जर्जर भवन, कच्चे मकान में पढ़ाई
मौके पर पड़ताल में सामने आया कि स्कूल भवन जर्जर हालत में है। मजबूरी में बच्चों को गांव के एक कच्चे मकान में बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। न पर्याप्त संसाधन, न नियमित उपस्थिति — ऐसे में बच्चों का भविष्य अधर में लटका है।
विद्यालय में पदस्थ सहायक शिक्षक लल्लू सिंह नाग ने भी स्वीकार किया कि प्रधान पाठक लंबे समय से विद्यालय नहीं आ रहे हैं। इससे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब सच्चाई सबके सामने है, तो कार्रवाई में देरी क्यों?
“क्या उखाड़ लेंगे मेरा?” — कथित बयान से बढ़ा विवाद
जब इस विषय पर प्रधान पाठक से फोन पर संपर्क किया गया और उनकी अनुपस्थिति को लेकर सवाल पूछे गए, तो कथित तौर पर उनका जवाब और भी हैरान करने वाला था। ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने कहा —
“गांव वाले जब से कह रहे हैं कि मैं अनुपस्थित हूं, तब से अनुपस्थित हूं।”
इतना ही नहीं, जब शिकायत की बात उठी तो कथित तौर पर उन्होंने कहा —
“क्या उखाड़ लेंगे मेरा?”
यदि यह बयान सही है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए चिंता का विषय है।
नोटिस जारी, पर क्या होगी ठोस कार्रवाई?
मामले की जानकारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी एस.के. सिदार को दी गई। उन्होंने बताया कि प्रकरण उनके संज्ञान में है और 17 फरवरी को कारण बताओ नोटिस जारी किया जा चुका है।
हालांकि ग्रामीणों का सवाल बरकरार है —
क्या केवल नोटिस से व्यवस्था सुधरेगी?
या फिर बच्चों के भविष्य से जुड़े इस मामले में सख्त और उदाहरणात्मक कार्रवाई होगी?
बड़ा सवाल
जब जिम्मेदार पद पर बैठे लोग ही नियमों को चुनौती देने लगें, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। धरमजयगढ़ की यह घटना सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत भी उजागर करती है।
अब देखना यह है कि संबंधित विभाग कागजी प्रक्रिया से आगे बढ़कर क्या ठोस कदम उठाता है। क्योंकि यहां मुद्दा केवल अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य का है।







