फरीदपुर उपचुनाव: सपा के टिकट की दावेदारी में दिख रहा अजीब खेल, हार के डर से पीछे हटते नज़र आ रहे दावेदार…
सत्यम गौड़। फरीदपुर
फरीदपुर की खास रिपोर्ट….✍️
फरीदपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी के भीतर सियासी सरगर्मी लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन तस्वीर जितनी बाहर से साफ दिखती है, अंदरखाने उतनी ही उलझी हुई है। पार्टी में जिन तीन नामों—विजयपाल सिंह, चन्द्रसेन सागर और कल्पना सागर—की सबसे ज्यादा चर्चा है, वे सभी टिकट की दौड़ में शामिल तो माने जा रहे हैं, लेकिन खुलकर आगे आने से बचते नजर आ रहे हैं। इसकी बड़ी वजह उपचुनाव का कठिन सियासी माहौल और हार का वह डर बताया जा रहा है, जिसका सीधा असर 2027 के विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सपा के भीतर यह साफ संदेश माना जा रहा है कि यदि उपचुनाव में किसी नेता को टिकट मिलता है और उसकी हार हो जाती है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में उसी चेहरे को दोबारा मौका मिलना बेहद मुश्किल हो जाएगा। यही आशंका तीनों संभावित दावेदारों को असमंजस में डाल रही है। कोई भी नेता नहीं चाहता कि उपचुनाव की संभावित हार उसके भविष्य के राजनीतिक रास्ते पर स्थायी ब्रेक लगा दे। विजयपाल सिंह अपने लंबे अनुभव, पुराने कार्यकर्ताओं में पकड़ और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर मजबूत दावेदार माने जाते हैं, लेकिन बदले हुए राजनीतिक समीकरण और उपचुनाव की अनिश्चितता को देखते हुए वे भी पूरी तरह आगे आने से हिचकते दिख रहे हैं।

पार्टी के अंदर यह चर्चा आम है कि यदि परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल नहीं रहीं और हार हुई, तो 2027 में उनका दावा स्वतः कमजोर पड़ जाएगा, इसी डर ने उन्हें सतर्क कर रखा है। चन्द्रसेन सागर, जिन्हें सक्रिय नेता के तौर पर देखा जाता है, भी फिलहाल स्थिति को परखने की रणनीति पर चल रहे हैं। जानकारों का कहना है कि वे संगठन और नेतृत्व के संकेत का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि उपचुनाव में हार की स्थिति में उनकी उभरती राजनीतिक छवि को गहरा झटका लग सकता है और 2027 के टिकट की राह लगभग बंद हो सकती है। यही वजह है कि वे खुलकर टिकट मांगने के बजाय बैकफुट पर नजर आ रहे हैं।

वहीं कल्पना सागर को महिला नेतृत्व और सामाजिक संतुलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है, लेकिन उनके सामने भी वही सवाल खड़ा है—क्या उपचुनाव का जोखिम उठाया जाए? अंदरूनी चर्चाओं के अनुसार, यदि हार हुई तो न सिर्फ मौजूदा सियासी प्रतिष्ठा पर असर पड़ेगा, बल्कि 2027 में टिकट की संभावनाएं भी कमजोर हो जाएंगी। यही कारण है कि वे भी अंतिम फैसला लेने से पहले हर पहलू को तौल रही हैं।
कुल मिलाकर फरीदपुर उपचुनाव में सपा की टिकट को लेकर मुकाबला कम और आशंकाओं का खेल ज्यादा नजर आ रहा है। तीनों नेता दावेदार हैं, लेकिन हार और 2027 के भविष्य को लेकर बनी आशंका ने सभी को सतर्क कर दिया है। अब पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसे माहौल में किस चेहरे पर भरोसा किया जाए, जो न सिर्फ चुनाव लड़े, बल्कि संभावित जोखिम के बावजूद पूरी मजबूती से मैदान में उतरे।




