अपनों के ‘मातम’ पर भारी पड़ा ‘स्वागत’: भाजपा विधायक की मौत होने पर CM आए, प्रदेश अध्यक्ष बगल के जिले में माला पहनते रहे…
▪️सरकार और संगठन के नाम तीखे सवाल ??
सत्यम गौड़। फरीदपुर
उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर क्या सब कुछ ठीक चल रहा है? यह सवाल आज बरेली से लेकर लखनऊ तक की गलियारों में गूंज रहा है। मौका गमगीन था, फरीदपुर से भाजपा के कद्दावर दलित चेहरे और दूसरी बार के विधायक प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल के अंतिम विदाई का। एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली से शोक संदेश भेज रहे थे, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रोटोकॉल तोड़कर खुद मृतक विधायक के दरवाजे पर सांत्वना देने पहुंचे, लेकिन पार्टी के ‘संगठन के मुखिया’ प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को अपने ही विधायक के लिए दो मिनट का समय नहीं मिला।
हैरानी की बात यह है कि जिस वक्त फरीदपुर में विधायक का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो रहा था, उससे चंद किलोमीटर दूर मुरादाबाद में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ढोल-नगाड़ों के बीच अपना स्वागत करवा रहे थे। अब इस मामले ने न सिर्फ जातिगत रंग ले लिया है, बल्कि भाजपा के भीतर ‘सरकार बनाम संगठन’ की जंग को भी हवा दे दी है। विपक्ष ने इसे दलितों का अपमान बताते हुए सरकार को घेरा है।

बगल में जश्न, घर में मातम- क्या यही है ‘कार्यकर्ता आधारित’ पार्टी?
प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल कोई साधारण नाम नहीं थे। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपनी राजनीति शुरू करने वाले और दो बार के विधायक रहे श्याम बिहारी का कद बरेली मंडल में काफी बड़ा था। 3 जनवरी को सर्किट हाउस में मीटिंग के दौरान उन्हें हार्ट अटैक आया और उनका निधन हो गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कार्यक्रम अचानक बना और वे दो घंटे के भीतर बरेली पहुंचे। उन्होंने परिवार के एक-एक सदस्य से बात की, ढांढस बंधाया।
लेकिन, संगठन के मुखिया पंकज चौधरी उसी दिन मुरादाबाद के दौरे पर थे। बरेली और मुरादाबाद की दूरी महज कुछ घंटों की है। सियासी हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या एक कद्दावर विधायक की मौत से ज्यादा जरूरी प्रदेश अध्यक्ष का स्वागत समारोह था? क्या मालाएं पहनना और फोटो खिंचवाना उस परिवार के दुख से बड़ा हो गया जिसने अपना सब कुछ खो दिया?
सपा बोली -दलित थे, इसलिए नहीं आए अध्यक्ष
समाजवादी पार्टी ने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया है। सपा के जिलाध्यक्ष शिव चरन कश्यप ने कहा- भाजपा के लोग एससी (SC) समाज के विधायकों को बिल्कुल सम्मान नहीं देते। क्योंकि श्याम बिहारी दलित विधायक थे, इसलिए प्रदेश अध्यक्ष वहां शामिल नहीं हुए। हमारी उस दिन मासिक मीटिंग थी, लेकिन जैसे ही हमें खबर मिली, हमने तुरंत अपनी मीटिंग कैंसिल कर दी। प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल की अंत्येष्टि में हमारी पार्टी के सभी लोग शामिल हुए, विपक्ष का धर्म निभाया। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी हैं, जो अपना स्वागत करवाते हुए घूम रहे हैं। यह शर्मनाक है।”
कांग्रेस का तंज: ‘मुख्यमंत्री और अध्यक्ष के बीच खिंची हैं तलवारें’
कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को भाजपा के आंतरिक कलह के रूप में पेश किया है। कांग्रेस प्रवक्ता केबी त्रिपाठी ने कहा-विधायक प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल दूसरी बार के विधायक थे। सर्किट हाउस में मीटिंग के दौरान उनका स्वास्थ्य खराब हुआ और उनका निधन हो गया। मैं इस बात से क्षुब्ध हूं कि सर्किट हाउस जैसी जगह पर उन्हें समय पर चिकित्सीय सहायता नहीं मिली। अगर सरकार अपने जनप्रतिनिधियों को इलाज नहीं दे पा रही, तो आम आदमी का क्या होगा? रही बात शोक व्यक्त करने की, तो भाजपा की निर्लज्जता ऐसे ही मौकों पर दिखती है। ये पूरी तरह निर्लज्ज हो चुके हैं, इनमें नैतिकता नहीं बची। इन्हें सिर्फ वोट बैंक की राजनीति करनी है।”
त्रिपाठी ने आगे जोड़ा: “संगठन और सरकार के बीच जो अंतर्विरोध चल रहे हैं, उसका नुकसान जनता झेल रही है। वह परिवार क्या सोचेगा जिसका मुखिया चला गया और पार्टी अध्यक्ष बगल में जश्न मना रहे थे? जिस व्यक्ति ने विद्यार्थी परिषद से लेकर भाजपा तक अपना जीवन समर्पित कर दिया, उसके लिए प्रदेश अध्यक्ष के पास दो मिनट नहीं हैं? मुझे इस राजनीति पर घिन आती है। शायद विधायक जी SC/ST कैटेगरी से थे, इसलिए अध्यक्ष जी को लगा कि उपचुनाव के समीकरण न बिगड़ जाएं। मुझे तो यह मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच की खिंची हुई तलवारें लगती हैं।”

भाजपा जिलाध्यक्ष बोले-पार्टी को बहुत बड़ी क्षति
एक तरफ जहां विपक्ष हमलावर है, वहीं स्थानीय भाजपा नेतृत्व पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में है। भाजपा जिलाध्यक्ष आदेश प्रताप सिंह ने इस विवाद पर पर्दा डालने की कोशिश की, हालांकि उनके बयानों में भी दर्द झलका। आदेश प्रताप सिंह ने कहा: “पार्टी को बहुत बड़ी क्षति हुई है। फरीदपुर ने सिर्फ विधायक नहीं, अपना अभिभावक खोया है। उन्होंने फरीदपुर में लगातार दो बार न जीतने का मिथक तोड़ा था। वे 100% संगठन के कार्यकर्ता थे। पीएम, गृहमंत्री की शोक संवेदना प्रकट करना और मुख्यमंत्री का आना यह दर्शाता है कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं के साथ खड़ी है।”
जब उनसे प्रदेश अध्यक्ष के न आने पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बचाव करते हुए कहा- “प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने परिवार से फोन पर बातचीत की थी। उनकी व्यस्तता रहती है। जब उन्हें समय मिलेगा, तो वो परिवार के साथ संवेदना व्यक्त करने जरूर आएंगे।”
क्या यह सिर्फ ‘व्यस्तता’ है या कुछ और? यूपी भाजपा में पिछले कुछ समय से सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है। मुख्यमंत्री और प्रदेश संगठन के बीच समन्वय की कमी की खबरें अक्सर आती रहती हैं। बरेली की इस घटना ने उन चर्चाओं को फिर से जिंदा कर दिया श्याम बिहारी लाल नट दलित समुदाय से आते थे। विपक्ष इसे 2027 के चुनाव से पहले बड़ा मुद्दा बना सकता है।
संगठन बनाम सरकार: मुख्यमंत्री का तुरंत पहुंचना और प्रदेश अध्यक्ष का स्वागत में व्यस्त रहना, पार्टी के भीतर दो अलग-अलग ध्रुवों को दर्शाता है।
कार्यकर्ता का मनोबल: जो कार्यकर्ता वर्षों से दरी बिछाते हैं, वे आज यह देख रहे हैं कि एक समर्पित विधायक के निधन पर भी संगठन के शीर्ष नेतृत्व के पास वक्त की कमी है।
सवाल वही है- क्या पंकज चौधरी के लिए मुरादाबाद की मालाएं, बरेली के मातम से ज्यादा कीमती थीं?
क्या दलित विधायक की निष्ठा का मूल्य सिर्फ ‘एक फोन कॉल’ है?
जिस विधायक ने एबीवीपी से लेकर भाजपा तक अपना जीवन खपा दिया, क्या उनके निधन पर प्रदेश अध्यक्ष का 2 घंटे के लिए न पहुंचना उनकी जाति के प्रति उपेक्षा को नहीं दर्शाता?
स्वागत की मालाएं या साथी को विदाई: भाजपा की प्राथमिकता क्या है? मुरादाबाद और बरेली के बीच चंद घंटों का फासला है। क्या पंकज चौधरी के लिए खुद का स्वागत समारोह, अपने ही एक समर्पित सिटिंग विधायक की अंतिम विदाई से ज्यादा महत्वपूर्ण था?
क्या भाजपा में ‘दो फाड़’ हो चुकी है? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तुरंत पहुंच जाते हैं, लेकिन संगठन के मुखिया गायब रहते हैं। क्या यह मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच चल रही ‘कोल्ड वॉर’ का नतीजा है, जिसका खामियाजा एक शोकाकुल परिवार को भुगतना पड़ा?
सर्किट हाउस में ‘इलाज की कमी’ का जिम्मेदार कौन? एक सत्ताधारी दल का विधायक सरकारी परिसर (सर्किट हाउस) में दम तोड़ देता है और उसे समय पर मेडिकल हेल्प नहीं मिलती। जब विधायक सुरक्षित नहीं, तो उत्तर प्रदेश की आम जनता के स्वास्थ्य की क्या गारंटी है?
क्या उपचुनावों के डर से बनाई गई दूरी? क्या भाजपा संगठन को यह डर था कि दलित विधायक के घर जाने से उनके अन्य वोट बैंक समीकरण प्रभावित होंगे, या फिर यह पूरी तरह से संवेदनहीनता का मामला है?




