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08/07/2026

पंडवानी की अमर आवाज़ को अंतिम नमन: 14 जुलाई को डॉ. तीजन बाई की श्रद्धांजलि सभा, तैयारियों में जुटा पूरा प्रशासन…

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दुर्ग। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण सम्मानित पंडवानी सम्राज्ञी डॉ. तीजन बाई को भावभीनी और गरिमामयी विदाई देने की तैयारियां तेज हो गई हैं। उनके दशगात्र और श्रद्धांजलि कार्यक्रम को लेकर राज्य सरकार ने व्यापक इंतजाम शुरू कर दिए हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव सोमवार को दुर्ग जिले के गनियारी गांव स्थित दिवंगत कलाकार के निवास पहुंचे और परिजनों से मिलकर शोक संवेदनाएं व्यक्त कीं।

14 जुलाई को उमड़ेगा श्रद्धा का सैलाब

राज्य सरकार की ओर से 14 जुलाई को आयोजित होने वाले श्रद्धांजलि कार्यक्रम में देशभर से कलाकार, साहित्यकार, सांस्कृतिक हस्तियां, जनप्रतिनिधि और हजारों प्रशंसकों के पहुंचने की संभावना है। इसे देखते हुए प्रशासन ने कार्यक्रम को सुव्यवस्थित और सम्मानजनक बनाने की तैयारियां तेज कर दी हैं।

बैठक, पार्किंग और भोजन व्यवस्था पर विशेष फोकस

मंत्री गजेंद्र यादव ने अधिकारियों के साथ तैयारियों की समीक्षा करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि श्रद्धांजलि सभा में आने वाले प्रत्येक अतिथि और आमजन को किसी प्रकार की असुविधा न हो। इसके लिए बैठक व्यवस्था, पार्किंग, पेयजल, भोजन और अन्य मूलभूत सुविधाओं को मजबूत करने के निर्देश दिए गए। परिजनों को भी आश्वस्त किया गया कि राज्य सरकार इस कठिन समय में उनके साथ पूरी संवेदनशीलता के साथ खड़ी है।

छत्तीसगढ़ की पहचान थीं डॉ. तीजन बाई’

परिजनों से मुलाकात के दौरान मंत्री ने कहा कि डॉ. तीजन बाई का निधन केवल एक महान कलाकार का जाना नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक धरोहर को हुई ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उन्होंने अपनी अद्वितीय पंडवानी गायन शैली से छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा की अमिट विरासत छोड़ गईं।

प्रशासनिक अमला रहा मौजूद

मंत्री के दौरे के दौरान भिलाई-चरोदा के महापौर निर्मल कोसरे, जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी, पुलिस विभाग के अधिकारी तथा क्षेत्र के अनेक जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने दिवंगत लोकगायिका को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।

डॉ. तीजन बाई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी कला और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्वपटल पर दिलाई गई पहचान हमेशा अमर रहेगी।


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